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रविवार, 16 मई 2010

mOla

ना जाने आदमी क्यों हैवान बना मौला

इन्सान को तू फिर से इन्सान बना मौला|


छ:इंच का भरने को छ:फुट के हाथ पाए

फिर हाथ पसारे क्यों कंगाल बना मौला|


फूटी न थी इक कौड़ी इंसानियत बड़ी थी

है अरब-खरब फिर भी गुनहगार बना मौला|

अनपढ़ गंवार था पर था प्यार से लबा-लब

अब चार हरफ़ पढ़ कर शैतान बना मौला|


खूंखार भेड़िये भी ऐसे न वार करते

बे बात में ही यह तो हथियार बना मौला|


दुनिया की बगीची का जिसको बनाया माली

बहरूपिया मगर वह हकदार बना मौला|

मौला का करम सब पर रहता है "शलभ"यकसाँ

क्यों शेख-बिरहमिन का संसार बना मौला|

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