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बुधवार, 21 अप्रैल 2010

तमाम रात बहुत जद्दो-जेहद चलती है
तब कहीं जा के शमा सहर तलक जलती है|
आग सीने में धधकती कदम रुकें कैसे
लहु रिसते हुए पांवों से डगर चलती है|
हवा के झोंके दबाते हैं जब गला कसकर
उथली-उथली ही सही साँस मगर चलती है|
जलने वालों को पता खूब है अंजाम मगर
उसकी क़ुरबानी अंधेरों को बहुत खलती है|
"शलभ" कहीं से वो आता है फिर शलभ बनकर
डूबती प्रीत में जिसकी वो प्रीत छलती है|
डा.रोहितश्याम चतुर्वेदी "शलभ"