तमाम रात बहुत जद्दो-जेहद चलती है
तब कहीं जा के शमा सहर तलक जलती है|
आग सीने में धधकती कदम रुकें कैसे
लहु रिसते हुए पांवों से डगर चलती है|
हवा के झोंके दबाते हैं जब गला कसकर
उथली-उथली ही सही साँस मगर चलती है|
जलने वालों को पता खूब है अंजाम मगर
उसकी क़ुरबानी अंधेरों को बहुत खलती है|
"शलभ" कहीं से वो आता है फिर शलभ बनकर
डूबती प्रीत में जिसकी वो प्रीत छलती है|
डा.रोहितश्याम चतुर्वेदी "शलभ"
बुधवार, 21 अप्रैल 2010
मंगलवार, 5 जनवरी 2010
आदत बुरी सुधार लो बस हो गया भजन|
Rohitshyam Chaturvedi htp\\;www.shalabh-sanvadblogs.pots.com
जीवन देवता की साधना
मनुष्य का जीवन भगवान् की ओर से मिला एक अनुपम अदभुत एवं अमूल्य उपहार है |लेकिन जिस प्रकार से हम मुफ्त में मिली हुई वस्तुओं को महत्त्व नहीं देते,उसी प्रकार हम में से अधिकांश इस बहुमूल्य जीवन का महत्त्व भी पूरी तरह से न समझकर उसे जैसे-तैसे काट देते हैं |मनुष्य के जीवन को ऐसे ही बहुमूल्य नहीं कहा गया है, पूरी सृष्टि के प्राणियों पर नज़र दौडाइए ऐसा सुन्दर एवं उपयोगी शरीर भला है किसी के पास?उसके उपरांत बोलने, मुस्कुराने तथा सोचने-समझाने की क्षमताओं को यदि जोड़ दिया जाये तो हम किसी राजकुमार से कम नहीं हैं|लेकिन क्या हम एक राजकुमार जैसा जीवन जी रहे हैं? उत्तर हाँ में शायद ही मिले|सुबह-सवेरे चिड़िया चह -चहाते हुए,कोयल गाते-गुनगुनाते हुए, खरगोश और हिरन कुलांचे भरते हुए अपने दिन का प्रारम्भ करते हैं और प्रकृति का अनुसरण करते हुए मौज -मस्ती का जीवन जी कर आखिर में बूढ़े होकर मरते हैं|लेकिन इस पूरी दुनिया में एक ही बेवकूफ प्राणी है जिसका नाम है मनुष्य,जो रोते हुए पैदा होता है,कलपते हुए जीवन जीता है और अनेकानेक व्याधियों से ग्रस्त हो कर कराहते हुए मर जाता है| परमात्मा ने जब इस सृष्टि का निर्माण पूर्ण किया होगा तब उन्हें इसकी देख-भाल रखने वाले की आवश्यकता महसूस हुई होगी और इसी आवश्यकता ने भगवानजी को मनुष्य के आविष्कार की प्रेरणा दी होगी| अर्थात जिसे विश्व-वसुधा रूपी बाग़ का माली बना कर भेजा गया था वह मालिक बन बैठा और मालिक ही तो मनमानी करता है ना? उसकी इसी मनमानी ने न सिर्फ उसका अपना स्वास्थ्य ही बिगाड़ा वरन पृथ्वी,जल,वायु आकाश सब को प्रदूषित कर के पेड़-पौधों तक का जीना दुष्वार कर दिया है| ----क्रमश:-------
जीवन देवता की साधना
मनुष्य का जीवन भगवान् की ओर से मिला एक अनुपम अदभुत एवं अमूल्य उपहार है |लेकिन जिस प्रकार से हम मुफ्त में मिली हुई वस्तुओं को महत्त्व नहीं देते,उसी प्रकार हम में से अधिकांश इस बहुमूल्य जीवन का महत्त्व भी पूरी तरह से न समझकर उसे जैसे-तैसे काट देते हैं |मनुष्य के जीवन को ऐसे ही बहुमूल्य नहीं कहा गया है, पूरी सृष्टि के प्राणियों पर नज़र दौडाइए ऐसा सुन्दर एवं उपयोगी शरीर भला है किसी के पास?उसके उपरांत बोलने, मुस्कुराने तथा सोचने-समझाने की क्षमताओं को यदि जोड़ दिया जाये तो हम किसी राजकुमार से कम नहीं हैं|लेकिन क्या हम एक राजकुमार जैसा जीवन जी रहे हैं? उत्तर हाँ में शायद ही मिले|सुबह-सवेरे चिड़िया चह -चहाते हुए,कोयल गाते-गुनगुनाते हुए, खरगोश और हिरन कुलांचे भरते हुए अपने दिन का प्रारम्भ करते हैं और प्रकृति का अनुसरण करते हुए मौज -मस्ती का जीवन जी कर आखिर में बूढ़े होकर मरते हैं|लेकिन इस पूरी दुनिया में एक ही बेवकूफ प्राणी है जिसका नाम है मनुष्य,जो रोते हुए पैदा होता है,कलपते हुए जीवन जीता है और अनेकानेक व्याधियों से ग्रस्त हो कर कराहते हुए मर जाता है| परमात्मा ने जब इस सृष्टि का निर्माण पूर्ण किया होगा तब उन्हें इसकी देख-भाल रखने वाले की आवश्यकता महसूस हुई होगी और इसी आवश्यकता ने भगवानजी को मनुष्य के आविष्कार की प्रेरणा दी होगी| अर्थात जिसे विश्व-वसुधा रूपी बाग़ का माली बना कर भेजा गया था वह मालिक बन बैठा और मालिक ही तो मनमानी करता है ना? उसकी इसी मनमानी ने न सिर्फ उसका अपना स्वास्थ्य ही बिगाड़ा वरन पृथ्वी,जल,वायु आकाश सब को प्रदूषित कर के पेड़-पौधों तक का जीना दुष्वार कर दिया है| ----क्रमश:-------
शनिवार, 2 जनवरी 2010
nav-varsh ki kamana--
आशा है नव-वर्ष यह दो हजार और दस ,
कहे मुई महंगाई से बस बहन जी बस |
बस बहन जी बस,त्रस्त है जनता सारी,
नीचे उतरो ये छोटी सी अरज हमारी|
करें 'शलभ' कविराय बिनती इतनी सी बस,
भ्रष्टाचार को निगल जाये ये दो हजार दस|
कहे मुई महंगाई से बस बहन जी बस |
बस बहन जी बस,त्रस्त है जनता सारी,
नीचे उतरो ये छोटी सी अरज हमारी|
करें 'शलभ' कविराय बिनती इतनी सी बस,
भ्रष्टाचार को निगल जाये ये दो हजार दस|
मंगलवार, 15 दिसंबर 2009
जीवन-मंत्र
वन्देमातरम गीत नहीं मैं मंत्र हूँ जीने-मरने का|
बना रहे हथियार मुझे क्यों अपनो से ही लड़ने का|
जिनने अपनाया मुझको वे सबकुछ अपना भूल गए,
मात्रु -भूमि पर जिए-मरे हंस-हंस फंसी पर झूल गए|
वीर शिवा,राणा,हमीद लक्ष्मीबाई से अभिमानी,
भगतसिंह,आजाद,राज,सुख औ बिस्मिल से बलिदानी|
अवसर चूक न जाना उनके पद-चिन्हों पर चलने का|
वन्देमातरम गीत नहीं मैं मंत्र हूँ जीने-मरने का|
करनेवाले काम बहुत हैं व्यर्थ उलझनों को छोड़ो,
मुल्ला-पंडित तोड़ रहे हैं तुम खुद अपनों को जोड़ो|
भूख,बीमारी,बेकारी,आतंकवाद से लड़ना है,
कदम मिलाकर दुनिया से आगे ही आगे बढ़ना है|
भटक गए हैं लक्ष्य से जो अवसर दो उन्हें सुधरने का|
वन्देमातरम गीत नहीं मैं मंत्र हूँ जीने-मरने का|
चंदा-तारे सुख देते पर पोषण कभी नहीं देते,
केवल धरती माँ से ही ये वृक्ष जीवन रस लेते|
जननी और जन्म-भूमि को ज़न्नत से बढ़कर मानें,
छुपे हुए गद्दारों को जितनी जल्दी हो पहचानें|
जागो-जागो यही समय है अपनीं जड़ें पकडनें का|
वन्देमातरम गीत नहीं मैं मंत्र हूँ जीने-मरने का|
डा. रोहितश्याम चतुर्वेदी "शलभ"
बना रहे हथियार मुझे क्यों अपनो से ही लड़ने का|
जिनने अपनाया मुझको वे सबकुछ अपना भूल गए,
मात्रु -भूमि पर जिए-मरे हंस-हंस फंसी पर झूल गए|
वीर शिवा,राणा,हमीद लक्ष्मीबाई से अभिमानी,
भगतसिंह,आजाद,राज,सुख औ बिस्मिल से बलिदानी|
अवसर चूक न जाना उनके पद-चिन्हों पर चलने का|
वन्देमातरम गीत नहीं मैं मंत्र हूँ जीने-मरने का|
करनेवाले काम बहुत हैं व्यर्थ उलझनों को छोड़ो,
मुल्ला-पंडित तोड़ रहे हैं तुम खुद अपनों को जोड़ो|
भूख,बीमारी,बेकारी,आतंकवाद से लड़ना है,
कदम मिलाकर दुनिया से आगे ही आगे बढ़ना है|
भटक गए हैं लक्ष्य से जो अवसर दो उन्हें सुधरने का|
वन्देमातरम गीत नहीं मैं मंत्र हूँ जीने-मरने का|
चंदा-तारे सुख देते पर पोषण कभी नहीं देते,
केवल धरती माँ से ही ये वृक्ष जीवन रस लेते|
जननी और जन्म-भूमि को ज़न्नत से बढ़कर मानें,
छुपे हुए गद्दारों को जितनी जल्दी हो पहचानें|
जागो-जागो यही समय है अपनीं जड़ें पकडनें का|
वन्देमातरम गीत नहीं मैं मंत्र हूँ जीने-मरने का|
डा. रोहितश्याम चतुर्वेदी "शलभ"
बस अब और नहीं
इम्तिहान धीरज का वे देंगे कबतक?
बिना पंख के कहो उड़ेंगे वे कबतक?
बूढ़ी माता पूछ रही है रो-रो कर
सुध लेंगी उसकी ये संतानें कबतक?
खून शहीदी दौड़ रहा है नस-नस में
आखिर वे सब उसे सम्हालेंगे कबतक?
ओबामा को सुनो चुन लिया गाँधी ने
नाकारों का साथ भला देते कबतक?
देश नहीं तब क्या भाषा और क्या बोली,
राष्ट्रवाद के शंख-नाद होंगे कबतक?
ईजाद कर लिया उनने तो अपना मज्हब
"शलभ" ताब फतवों की और सहें कबतक?
इम्तिहान धीरज का वे देंगे कबतक?
बिना पंख के कहो उड़ेंगे वे कबतक?
बूढ़ी माता पूछ रही है रो-रो कर
सुध लेंगी उसकी ये संतानें कबतक?
खून शहीदी दौड़ रहा है नस-नस में
आखिर वे सब उसे सम्हालेंगे कबतक?
ओबामा को सुनो चुन लिया गाँधी ने
नाकारों का साथ भला देते कबतक?
देश नहीं तब क्या भाषा और क्या बोली,
राष्ट्रवाद के शंख-नाद होंगे कबतक?
ईजाद कर लिया उनने तो अपना मज्हब
"शलभ" ताब फतवों की और सहें कबतक?
मंगलवार, 8 दिसंबर 2009
हम बदलेंगे-युग बदलेगा
डा.रोहितश्याम चतुर्वेदी"शलभ"
चश्मे को बदलकर ज़रा देखिये ज़नाब|
उतरकर तो जमीं पर ज़रा देखिये ज़नाब|
-------०--------
बाबर था आततायी भला भूल गए क्यों?
चला वो लूटकर ज़रा देखिये ज़नाब|
--------०--------
लूटी नहीं दौलत,मुहब्बत भी लूट ली,
तोड़ा यकीं-ऐ- घर,ज़रा देखिये ज़नाब|
----------०--------
सज्दे में खुदा के तो जमीं चूमते हैं हम,
वन्देमातरम क्यों कुफ़र ज़रा सोचिये ज़नाब|
---------०----------
पुरखे हमारे एक और खून एक है,
अन्दर तो झांक कर ज़रा देखिये ज़नाब|
-----------०---------
मसला 'शलभ' न हल हो ये हो Nहीं सकता,
नीयत को साफ कर ज़रा देखिये ज़नाब|
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चश्मे को बदलकर ज़रा देखिये ज़नाब|
उतरकर तो जमीं पर ज़रा देखिये ज़नाब|
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बाबर था आततायी भला भूल गए क्यों?
चला वो लूटकर ज़रा देखिये ज़नाब|
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लूटी नहीं दौलत,मुहब्बत भी लूट ली,
तोड़ा यकीं-ऐ- घर,ज़रा देखिये ज़नाब|
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सज्दे में खुदा के तो जमीं चूमते हैं हम,
वन्देमातरम क्यों कुफ़र ज़रा सोचिये ज़नाब|
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पुरखे हमारे एक और खून एक है,
अन्दर तो झांक कर ज़रा देखिये ज़नाब|
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मसला 'शलभ' न हल हो ये हो Nहीं सकता,
नीयत को साफ कर ज़रा देखिये ज़नाब|
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शुक्रवार, 27 नवंबर 2009
मुस्कुराते रहो-
मुस्कुराते रहो-
मनहूसियत छोड़ करके मुस्कुराना सीखिए|
रूठना, मनना, मनाना, मानजाना सीखिए |
देर तक यूँ गमजदा रह भी न पाओगे ज़नाब,
'शलभ'कीइनमहफ़िलोंमेंखिलखिलानासीखिए| रोहितश्याम चतुर्वेदी 'शलभ'
मनहूसियत छोड़ करके मुस्कुराना सीखिए|
रूठना, मनना, मनाना, मानजाना सीखिए |
देर तक यूँ गमजदा रह भी न पाओगे ज़नाब,
'शलभ'कीइनमहफ़िलोंमेंखिलखिलानासीखिए| रोहितश्याम चतुर्वेदी 'शलभ'
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